Sankshipta Sundarakanda - A Telugu Poem
By Padmashri Elchuri Vijayraghavrao
A
Brief narration of
Valmiki Sundarakanda
by
Pandit Elchri Vijayraghavrao
लंकादहनमु
(next)
भीम बलुलैन राक्षसुलु
पीडिंचिननू वॆऱुवक,
अच्चट रावणासुरुनि गांचि
आश्चर्य भरितुडैन हनुम
तनलो तनु
तलिचॆनिट्लु
“एमि रूपमु! एमि धैर्यमु!
एमि सत्वमु! एमि तेजमु!
सर्व लक्षण संपन्नुडैन
सार्व भौमुनि सारूपष्यमिदि!
अग्रगुडु, ई राक्षसेंद्रुडु
अधर्ममुलनुसरिंचनि ऎड,
अमर लोकमु, इंद्रलोकमु
लंदु प्रभुवगुटकु
समर्थुडु!”
आक्रोषमु पॊंगिपोयि
अरुणमैन कन्नुलतो
मंत्रि प्रहस्तुनि जूचुचु
मंदलिंचॆ लंकेशुडु
“दुष्टुडु ई कपि इच्चट
दुमिकॆ नॆचटि नुंडि?
एल
दुष्क्रममुग अशोकवन
दृममुलेल 'दुमु' जेसॆनु?
ऎंदुकु राक्षस स्त्रील
नॆदिरिंचॆ
कनुगॊनवलयुनु”
प्रहस्तुडपुडु हनुमंतुनि
प्रश्निंचॆनु “वानरुडा!
वॆऱुव कॆंतमात्रमु. निनु
विडिपिंतुमु. निजमु चॆप्पु
इंद्रुनिचे पंपबडगा
ई नगरिकि वच्चितिवा?
कुबेरुनिकि, यमुनिकि, वरुणुनि
कॆव्वरिकैन नीवु
चारुड वै वच्चि इचट
चोरुनि वलॆ जॊच्चितिवा?
विष्णुदेवुनिकि दूतग
विच्चेसिन पिदप नीवु
रावणुनि जयिंचुटकै
राध्धांतमु पन्नितिवा?
वानरुल कसाध्यमैन
वज्रदेह तेजस्विवि!
विप्पि चॆप्पु. शीघ्रमुगा
विडुदल लभियिंचुनपुडु...
असत्यमुलु पलिकितिवो
असुवुलतो बयल्पडवु....”
अंतॆऱुगनि प्रश्नावळि
कत्युचित समाधानमु
लंद जेय निश्चयिंचि,
महासत्वमुनु पॊंदिन
मारुति
त्वरपडकुंडा
बुद्धिशालि रावणुनिकि
शुद्धिगल उत्तरुवुलिच्चॆनु
“राक्षसराजा! विनुमिक!
रामुनि सेवकुडनु नेनु...
मानवुडनु गानु. कपिनि.
'मारुति' ना शुभनाममु.
सुचरित्रुडु श्रीरामुडु
सृष्टि, स्थिति, लयल कर्त!
पंचभूत सहितमैन
प्रपंचमुनु हत मॊनर्चि
अट्टि लोकमुनु तृटिलो
अवतरिंप गलडु मरल!
अतनि चेत चंपदगिन
अभिजातुडवैन निन्नु,
शिवमॆत्तिन रणमुन
आ श्रीरामुनि ऎदुट निलिचि
ब्रह्म, रुद्र, महेंद्रुले
ब्रतिकिंचग लेरु सुमा!
रामुनि कक्रम मॊनर्चि,
रमिंचि सुखमॊंदु प्राणि
मुल्लोकमुलंदु लेडु!
मुम्माटिकि दुस्साध्यमु...
अर्थ युक्तमगु वाक्यमु
लालकिंचु प्रज्ञुडवै
त्रिकालयुतमगु धर्ममु
तीऱुपॆरिगि वर्तिंपुमु....
नरोत्तमुडु श्रीरामुडु
नारायणुडनि ग्रहिंचि
शीघ्रमतनि धर्मपत्नि
सीत नप्पगिंच तगुनु”
वानर वीरुडु पलिकिन
वाक्कुल कति कृद्धुडैन
दशाननुडु हनुमंतुनि
दळनमुनकु आज्ञनिच्चॆ!
धरणि पुत्रि सीत कॊऱकु
दौत्यमुकै एतॆंचिन
कपीश्वरुनि वधिंचुटनु
'कटु तरमगु अधर्म'मनि
रावणुनिकि अनुजुडु - रण
रंगयोध, विभीषणुडु,
अर्थ वंतमगु हितवुनु
अन्नकु तनु तॆलिय जॆप्प....
“कोपिंचक ना माटलु
कॊंचॆ मालकिंच दगुनु;
उचितानुचितमु लॆऱिगिन
उत्तमुलगु राजेंद्रुलु
नीतिग संदेशमिच्चु
दूत नॆपुडु दंडिंचरु”
विभीषणुनि हितवाक्यमु
विनिन दशाननुडप्पुडु
देशकालस्थितिकि तगिन
ध्येयमुतो निट्लु पलिकॆ
“नीवु चॆप्पिनदि निजमे;
निंद्यमु दूतनु चंपुट....
मरण दंडनमुनु मानि
मरियॊक शिक्ष विधिंतुनु;
कोतिकि तन तोकपैन
प्रीति मॆंडुगनक, इतनि
वालमुनकु निप्पु बॆट्टि
वानिनि विडिपिंचॆदनिक...”
हनुमंतुनिपै मिक्किलि
आग्रहमॊंदिन असुरलु
गुड्ड पीलिकल नंटिंचि
गुरिग वालमुनकु जुट्टिरि!
ऎंडिन उपवनमुललो
ऎगसिपोवु अग्नि पोलॆ
अतनि तोकपै मंटलु
अतिशयमुग पॆंपॊंदॆनु!
लांगूलाग्रपु मंटल
लास्यमु गनि असुर वनित ला
वार्तनु वैदेहिकि
आप्रियमुग तॆलिपिरिट्लु
“अडविलोन निनुगांचिन
अरुण वदनुडैन कोति
उज्वलमगु तन वालमु
ऊरंतयु दिप्पुचुंडॆ!!”
नियममुलनु पालिंचॆडु
निर्मलात्म - सीतादेवि
हनुमनु रक्षिंचुटकै
अग्निहोत्रुनि प्रार्थिंचॆनु
“अत्मशुचिग ने रामुनि
कादरणमु जेसिनचो
ज्वाल नुंडि हनुमंतुनि
जाग्रतगा रक्षिंपुमु...
असलु नाकु कॊंचॆमैन
अदृष्टमनिनदि युंडिन,
निप्पुलोनि 'वेडि' तीसि
नी चलवनु प्रेरिंपुमु....
रामुडु निजमुगा नन्नु
रापवळ्ळु स्मरिंचुचो
नी उष्णोग्रतनु वीडि
निम्मळिंचि अनुग्रहिंचु...”
अग्निहोत्रुडु, जानकि
ननुग्रहिंचिन गुरुतुग
विंतलॊलुकु ज्वाललतो
विजृंभिंचॆ हनुमंतुडु!
आमॆ नूऱडिंच वच्चिन
असुर 'सुरम' पलिकॆनिट्लु
“वैदेही! चिंत वलदु;
वीरुडु सर्व समर्थुडु.....
आंजनेयुनि गुरिंचि आतृत
पडवलदु नीवु.....
लंका दहन मॊनर्चुचु
लंघिंचॆ नभोवीधि नतडु!
कारु मब्बुल वलनु तॆंचि
कांति पुंजमुतो बयल्पडिन
रजनी करुनिवलॆ मारुति
रम्यमुगा वॆडलि वच्चॆ!”
आ वचनमुलु वैदेहिकि
अमित सुखमु कलिगिंचॆनु!
संकल्प सिद्धिगांचिन
समर योधुडु हनुमडु
मंडुतुन्न लंकनु गनि
मदिलो बहु संतसिंचॆ!
“लंकलोनि राकासुल
निंकॆंतो शिक्षिंचवलॆ...
नगर दुर्गमुनु त्वरितमु
नशिंपजेयवलॆ निप्पुडु....
अतिसुलुवुग ई कार्यमु
नंतु जेसि सफल मगुदु....
लांगू लाग्निनि रगिल्चि
रयमु भवनमुलनु कूल्चि
तृप्ति पॊंदुटे नाकै
तुल्यमैन न्यायमगुनु”
इट्लु तलचि पवनसुतुडु
इंचुग मिन्नंटि, तोक
अंचुन प्रज्वलितमैन
अग्निनि व्यापिंपजेसि
मेडलनु तुदमुट्टिंचुचु
मेघ वीधि संचरिंचॆ!
श्रीरामुनि पद ध्यानमु
सिद्धिग मदिलो वहिंचि
वायु वेगमुन मारुति
वडिवडि लंकनु दहिंचि,
सागरमुन तोक मुंचि
सांतमु चल्लार्चि, पिदप
मनसु कॊंत नॊच्चिनट्लु.
मंतनमुलु सेयदॊडगॆ!
“लंक निट्लु काल्चितिने!
लाभमेमि गनुपिंचॆनु?!
कोपिंचिन मनुजुडॆट्टि
पापमु नैननु जेयुनु...
क्रूरमैन सर्पमु तन
कुबुस मॆट्लु त्यजिंचुनो
कोपमट्लु त्यजिंचुकॊनगलवाडे
पुरुषुडु मरि ....
ओर्पु लेक
कूर्चु चॆदिरि
ए पापमु जेसितिनो!
ऎडद भग्नमगु चुन्नदि.....
दग्धमैनदी लंक....
दहिंपबडॆनेमो जानकि!
प्रयोजन रहितमुगा
प्रभु कार्यमु विफलमायॆ!”
आंजनेयुडी विधमुग
आदुर्दा पडिन वेळ
चॆलिमिग मिन्नुन चरिंचु
चारणुल वाक्कुलनु विनॆनु
“बुरुजुलु, प्राकारमुलु, द्वारमुलु
बूडिदयै पोयिननू
अहो! अद्भुतमु! जानकि
नग्नि मुट्टुकॊनने लेदु!
इंत आश्चर्य संघटन
निंतवरकु कनने लेदु!”
शिंशु पाक वृक्ष मूलमुन गल
सीता देनिनि दर्शिंप वॆडलि,
दरिजेरि नमस्करिंचि हनुमडु
दाक्ष्यमैन वाक्कुलिट्लु पलिकॆनु
“अम्मा! निनु क्षेममुगा वीक्षिंचॆडु
अदृष्टमु नाकु मरल कलिगॆनु!”
इट्लु नुडिवि
दीवॆनलु गैकॊनि
आकसमुन कॆगसॆनु
कपिवर्युडु...
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||om tat sat||
Valmiki Sundarakanda
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Pandit Elchri Vijayraghavrao
लंकादहनमु
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पीडिंचिननू वॆऱुवक,
अच्चट रावणासुरुनि गांचि
आश्चर्य भरितुडैन हनुम
तनलो तनु
तलिचॆनिट्लु
“एमि रूपमु! एमि धैर्यमु!
एमि सत्वमु! एमि तेजमु!
सर्व लक्षण संपन्नुडैन
सार्व भौमुनि सारूपष्यमिदि!
अग्रगुडु, ई राक्षसेंद्रुडु
अधर्ममुलनुसरिंचनि ऎड,
अमर लोकमु, इंद्रलोकमु
लंदु प्रभुवगुटकु
समर्थुडु!”
आक्रोषमु पॊंगिपोयि
अरुणमैन कन्नुलतो
मंत्रि प्रहस्तुनि जूचुचु
मंदलिंचॆ लंकेशुडु
“दुष्टुडु ई कपि इच्चट
दुमिकॆ नॆचटि नुंडि?
एल
दुष्क्रममुग अशोकवन
दृममुलेल 'दुमु' जेसॆनु?
ऎंदुकु राक्षस स्त्रील
नॆदिरिंचॆ
कनुगॊनवलयुनु”
प्रहस्तुडपुडु हनुमंतुनि
प्रश्निंचॆनु “वानरुडा!
वॆऱुव कॆंतमात्रमु. निनु
विडिपिंतुमु. निजमु चॆप्पु
इंद्रुनिचे पंपबडगा
ई नगरिकि वच्चितिवा?
कुबेरुनिकि, यमुनिकि, वरुणुनि
कॆव्वरिकैन नीवु
चारुड वै वच्चि इचट
चोरुनि वलॆ जॊच्चितिवा?
विष्णुदेवुनिकि दूतग
विच्चेसिन पिदप नीवु
रावणुनि जयिंचुटकै
राध्धांतमु पन्नितिवा?
वानरुल कसाध्यमैन
वज्रदेह तेजस्विवि!
विप्पि चॆप्पु. शीघ्रमुगा
विडुदल लभियिंचुनपुडु...
असत्यमुलु पलिकितिवो
असुवुलतो बयल्पडवु....”
अंतॆऱुगनि प्रश्नावळि
कत्युचित समाधानमु
लंद जेय निश्चयिंचि,
महासत्वमुनु पॊंदिन
मारुति
त्वरपडकुंडा
बुद्धिशालि रावणुनिकि
शुद्धिगल उत्तरुवुलिच्चॆनु
“राक्षसराजा! विनुमिक!
रामुनि सेवकुडनु नेनु...
मानवुडनु गानु. कपिनि.
'मारुति' ना शुभनाममु.
सुचरित्रुडु श्रीरामुडु
सृष्टि, स्थिति, लयल कर्त!
पंचभूत सहितमैन
प्रपंचमुनु हत मॊनर्चि
अट्टि लोकमुनु तृटिलो
अवतरिंप गलडु मरल!
अतनि चेत चंपदगिन
अभिजातुडवैन निन्नु,
शिवमॆत्तिन रणमुन
आ श्रीरामुनि ऎदुट निलिचि
ब्रह्म, रुद्र, महेंद्रुले
ब्रतिकिंचग लेरु सुमा!
रामुनि कक्रम मॊनर्चि,
रमिंचि सुखमॊंदु प्राणि
मुल्लोकमुलंदु लेडु!
मुम्माटिकि दुस्साध्यमु...
अर्थ युक्तमगु वाक्यमु
लालकिंचु प्रज्ञुडवै
त्रिकालयुतमगु धर्ममु
तीऱुपॆरिगि वर्तिंपुमु....
नरोत्तमुडु श्रीरामुडु
नारायणुडनि ग्रहिंचि
शीघ्रमतनि धर्मपत्नि
सीत नप्पगिंच तगुनु”
वानर वीरुडु पलिकिन
वाक्कुल कति कृद्धुडैन
दशाननुडु हनुमंतुनि
दळनमुनकु आज्ञनिच्चॆ!
धरणि पुत्रि सीत कॊऱकु
दौत्यमुकै एतॆंचिन
कपीश्वरुनि वधिंचुटनु
'कटु तरमगु अधर्म'मनि
रावणुनिकि अनुजुडु - रण
रंगयोध, विभीषणुडु,
अर्थ वंतमगु हितवुनु
अन्नकु तनु तॆलिय जॆप्प....
“कोपिंचक ना माटलु
कॊंचॆ मालकिंच दगुनु;
उचितानुचितमु लॆऱिगिन
उत्तमुलगु राजेंद्रुलु
नीतिग संदेशमिच्चु
दूत नॆपुडु दंडिंचरु”
विभीषणुनि हितवाक्यमु
विनिन दशाननुडप्पुडु
देशकालस्थितिकि तगिन
ध्येयमुतो निट्लु पलिकॆ
“नीवु चॆप्पिनदि निजमे;
निंद्यमु दूतनु चंपुट....
मरण दंडनमुनु मानि
मरियॊक शिक्ष विधिंतुनु;
कोतिकि तन तोकपैन
प्रीति मॆंडुगनक, इतनि
वालमुनकु निप्पु बॆट्टि
वानिनि विडिपिंचॆदनिक...”
हनुमंतुनिपै मिक्किलि
आग्रहमॊंदिन असुरलु
गुड्ड पीलिकल नंटिंचि
गुरिग वालमुनकु जुट्टिरि!
ऎंडिन उपवनमुललो
ऎगसिपोवु अग्नि पोलॆ
अतनि तोकपै मंटलु
अतिशयमुग पॆंपॊंदॆनु!
लांगूलाग्रपु मंटल
लास्यमु गनि असुर वनित ला
वार्तनु वैदेहिकि
आप्रियमुग तॆलिपिरिट्लु
“अडविलोन निनुगांचिन
अरुण वदनुडैन कोति
उज्वलमगु तन वालमु
ऊरंतयु दिप्पुचुंडॆ!!”
नियममुलनु पालिंचॆडु
निर्मलात्म - सीतादेवि
हनुमनु रक्षिंचुटकै
अग्निहोत्रुनि प्रार्थिंचॆनु
“अत्मशुचिग ने रामुनि
कादरणमु जेसिनचो
ज्वाल नुंडि हनुमंतुनि
जाग्रतगा रक्षिंपुमु...
असलु नाकु कॊंचॆमैन
अदृष्टमनिनदि युंडिन,
निप्पुलोनि 'वेडि' तीसि
नी चलवनु प्रेरिंपुमु....
रामुडु निजमुगा नन्नु
रापवळ्ळु स्मरिंचुचो
नी उष्णोग्रतनु वीडि
निम्मळिंचि अनुग्रहिंचु...”
अग्निहोत्रुडु, जानकि
ननुग्रहिंचिन गुरुतुग
विंतलॊलुकु ज्वाललतो
विजृंभिंचॆ हनुमंतुडु!
आमॆ नूऱडिंच वच्चिन
असुर 'सुरम' पलिकॆनिट्लु
“वैदेही! चिंत वलदु;
वीरुडु सर्व समर्थुडु.....
आंजनेयुनि गुरिंचि आतृत
पडवलदु नीवु.....
लंका दहन मॊनर्चुचु
लंघिंचॆ नभोवीधि नतडु!
कारु मब्बुल वलनु तॆंचि
कांति पुंजमुतो बयल्पडिन
रजनी करुनिवलॆ मारुति
रम्यमुगा वॆडलि वच्चॆ!”
आ वचनमुलु वैदेहिकि
अमित सुखमु कलिगिंचॆनु!
संकल्प सिद्धिगांचिन
समर योधुडु हनुमडु
मंडुतुन्न लंकनु गनि
मदिलो बहु संतसिंचॆ!
“लंकलोनि राकासुल
निंकॆंतो शिक्षिंचवलॆ...
नगर दुर्गमुनु त्वरितमु
नशिंपजेयवलॆ निप्पुडु....
अतिसुलुवुग ई कार्यमु
नंतु जेसि सफल मगुदु....
लांगू लाग्निनि रगिल्चि
रयमु भवनमुलनु कूल्चि
तृप्ति पॊंदुटे नाकै
तुल्यमैन न्यायमगुनु”
इट्लु तलचि पवनसुतुडु
इंचुग मिन्नंटि, तोक
अंचुन प्रज्वलितमैन
अग्निनि व्यापिंपजेसि
मेडलनु तुदमुट्टिंचुचु
मेघ वीधि संचरिंचॆ!
श्रीरामुनि पद ध्यानमु
सिद्धिग मदिलो वहिंचि
वायु वेगमुन मारुति
वडिवडि लंकनु दहिंचि,
सागरमुन तोक मुंचि
सांतमु चल्लार्चि, पिदप
मनसु कॊंत नॊच्चिनट्लु.
मंतनमुलु सेयदॊडगॆ!
“लंक निट्लु काल्चितिने!
लाभमेमि गनुपिंचॆनु?!
कोपिंचिन मनुजुडॆट्टि
पापमु नैननु जेयुनु...
क्रूरमैन सर्पमु तन
कुबुस मॆट्लु त्यजिंचुनो
कोपमट्लु त्यजिंचुकॊनगलवाडे
पुरुषुडु मरि ....
ओर्पु लेक
कूर्चु चॆदिरि
ए पापमु जेसितिनो!
ऎडद भग्नमगु चुन्नदि.....
दग्धमैनदी लंक....
दहिंपबडॆनेमो जानकि!
प्रयोजन रहितमुगा
प्रभु कार्यमु विफलमायॆ!”
आंजनेयुडी विधमुग
आदुर्दा पडिन वेळ
चॆलिमिग मिन्नुन चरिंचु
चारणुल वाक्कुलनु विनॆनु
“बुरुजुलु, प्राकारमुलु, द्वारमुलु
बूडिदयै पोयिननू
अहो! अद्भुतमु! जानकि
नग्नि मुट्टुकॊनने लेदु!
इंत आश्चर्य संघटन
निंतवरकु कनने लेदु!”
शिंशु पाक वृक्ष मूलमुन गल
सीता देनिनि दर्शिंप वॆडलि,
दरिजेरि नमस्करिंचि हनुमडु
दाक्ष्यमैन वाक्कुलिट्लु पलिकॆनु
“अम्मा! निनु क्षेममुगा वीक्षिंचॆडु
अदृष्टमु नाकु मरल कलिगॆनु!”
इट्लु नुडिवि
दीवॆनलु गैकॊनि
आकसमुन कॆगसॆनु
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