Sankshipta Sundarakanda - A Telugu Poem
By Padmashri Elchuri Vijayraghavrao
A Brief
narration of
Valmiki Sundarakanda
by
Pandit Elchri Vijayraghavrao
हनुमंतुनि जयघोष
( next )
अच्चट लंकापुरिलो
अंतॆऱगनि तॊट्रुपाटु!
पक्षि निनादमुलु,
बलियु वृक्षभंग स्वनमुलतो
पलुवुरि गुंडॆलदुरुचुंड.
भयानकमु आ दृश्यमु!
वॆऱपुनॊंदि राकासुलु
वॆळ्ळि रावणुनितो जॆप्पिरि
“ओ राजा! बलीयुडगु
वानरु डॊकडिनि कंटिमि!
अतडु सीतनु पलकरिंचि
अशोकवनमुनकु जेरॆनु...
अद्भुतमगु रूपुगलिगि
अंग बलमु गल आ कपि
विविध वन्यमृगमुलतो
विंतलॊलुकु अंदमुगल
अंत: पुरोद्यानवनमु
नंतयु ध्वंसमु जेसॆनु!
आ वन विध्वंसकुनिकि
अरिगॊनु शिक्षनु विधिंचि
अट्टि विनाशमु नापुट
काज्ञनीय गोरॆदमु”
अंतट रावणाधीशुडु
आरितेरिन किंकरुलनु
आ वानरुनि पट्टुकॊनुट
काज्ञ नॊसगि पंपिंचॆनु....
पर्वतमुल पॆकलिंचॆडु
बल भीमुडु हनुमंतुडु
भूमिनि तोकतो कॊट्टि
भूकंपित ध्वनुलु चेसॆ!!
महाकायुडै पॆरुगुचु
मदिंचि भुजमुल तट्टग
लंक शब्द भरितमै
प्रतिध्वनिंचॆ भीषणमुग!!
“राजवंश धीरुलैन
रामलक्ष्मणुलकु जयमु!!
राज सुग्रीवुनकु जयमु!!!
श्रममॆऱगनि कोसलपति
श्रीरामुनि दासुडनु...
शतृहतमु जेयु
वायुपुत्रुड,
नेने हनुमनु...
राळ्ळु, चॆट्लु, चेमलतो
रणमुन पोराडगलनु!
वेयिमंदि रावणुलनु
दूयगॊट्टि हतमार्चॆद!
राकासुलु चूचुचुंड
लंकनु ध्वंस मॊनरिंचि,
सति सीतकु मॊक्कि नेनु
समृद्धुडनै वॆडलॆद...
महात्मुडगु श्रीरामुनि
मक्कुडु शतृवुलारा!
स्वामितोड वैरमु मिमु
सर्वनाशनमु जेयुनु...
मीरुंडरु!
रावणुडुंडडु!
लंकापुरि वुंडदु!"
इट्लु पलिकि हनुमंतुडु
गरुत्मंतुनि चेजिक्किन
गरळ भरित भुजगमु वलॆ
पिडिकिट इनुप गुदिय बट्टि
पिंडि चेसॆ दानवुलनु!
किंकर सैन्यमु नशिंचि
'किर किर' क्रोधाग्नि रगिलि
युद्धमुलो सिद्धहस्तुडैन
प्रहस्तुनि सुतुनकु
हनुमनु हतमार्पुटकै
आज्ञनॊसगॆ
लंकेशुडु....
क्रूरमैन कोऱलतो
कूकरिंचु 'जंबुमालि”
प्रहस्तुनि पुत्रुडु
धीरुडु,
प्रवेष्टमुन धनुवुनु गॊनि
प्रतिस्पर्धकै वॆडलॆनु...
हनुमंतुनि धाटिकतडु
असुवुल नर्चिंचु कॊनग
रावणु डति कृद्धुडगुचु
राजस मंत्रुल सुतुलकु
हनुमंतुनि वधमुकॊऱकु
आदेशमु लंदजेसॆ...
अवनिलोन साटिलेनि
आंजनेयुनि पराक्रममुन
कागलेक वीरुलैन
असुरु लॆंदरो हतुलै,
इतरु लॆवरु वच्चिननू
इट रणमुनकु सिद्धमगुचु
वानरोत्तमुडु
तिरिगि
वनद्वारमु कडकेगॆनु....
महाबल पराक्रमुडगु
मारुति, भीषणरणमुन
मंत्रि पुत्रुलंदरिनी
मसि जेसिन वार्तलु विनि,
चतुरंग बलसमेतुलैन
चतुरुलु हतुलगुट जूचि,
युगांतमुन यमुनि बोलु योध-
मारुति गाविंचिन
दुर्गतिकै परितपिंचि, दुष्टुडु रावणासुरुडु
तन दुःखमु लोलोन मिंगॆनु!
विरूपाक्ष यापाक्षुलु
विक्रम वीरुलु,
योधुलु...
दुर्धर, प्रघन, दान कर्णुलु
दुरंधर सैन्याधि पतुलु....
हनुमंतुनि चंपुटकै
आज्ञापिंप बडुटचे
रथ गज तुरग पदातुलु
रयमुग गॊनि
युद्धमुलो
कदनुदॊक्कि ई वीरुलु
कदिलिरि हनुमनु गॊनुटकु...
अंतटि घन बलगमुतो
हतमैरी अयिदुगुरू!!
तिरिगि वनद्वारमु कड
करिगिन हनुमंतुडपुडु
युगांतमुन यमुनि बोलॆ
'भग भग' प्रज्वलिंचॆ
मरल!
धुरंधरुलैन अयिदुगुरि
दुर्मरणमुनु विनिन पिदप
कय्यमुनकु कालु दुव्वि
कदनु दॊक्कु योधयैन
अतिधीरुडु, अस्त्रवेत्त
अविरळ तेजस्वियैन
इंद्रजित्तु, तंड्रि याज्ञ
निच्चगिंचि, तन मदिलो
'हनुमंतुनि चंपुट बहु
असाध्यकार्यम'नि तलंचि,
बडबानलमुनु गक्कॆडु
ब्रह्मास्त्रमु संधिंचॆनु!!
ब्रह्मास्त्रपु बलशक्तिनि
बागुग हनुमंतुडॆऱुगु....
'शस्त्रमेदियुनु तनपै
शक्ति जूप जाल' दनॆडु
वरमिच्चिन सृष्टिकर्त
वचनमुलनु दलचुकॊनुचु,
आ यानति ननुसरिंचि
आस्त्रगतिकि किंचु लॊंगॆ!
मत्तगजमु वलॆ घनुडगु
मारुतिनि बंधिंचि राक्षसुलु
रावणाधीश्वरुनि चॆंतकु
'रयमुग गॊनि पोयि, अचट
पुंखानु पुंखमुलुग
पुन: पुनः: प्रश्नजेसिरि
“ऎव्वडितडु? ऎवनि वाडु?
ऎंदुकिटकु विच्चेसॆनु?
इचट नितनि कार्यमेमि?
ऎवरि कडकु वच्चॆ” ननुचु
पलुविधमुल चर्चिंचुचु
पवन सुतुनि
पीडिंचिरि!
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Pandit Elchri Vijayraghavrao
हनुमंतुनि जयघोष
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अंतॆऱगनि तॊट्रुपाटु!
पक्षि निनादमुलु,
बलियु वृक्षभंग स्वनमुलतो
पलुवुरि गुंडॆलदुरुचुंड.
भयानकमु आ दृश्यमु!
वॆऱपुनॊंदि राकासुलु
वॆळ्ळि रावणुनितो जॆप्पिरि
“ओ राजा! बलीयुडगु
वानरु डॊकडिनि कंटिमि!
अतडु सीतनु पलकरिंचि
अशोकवनमुनकु जेरॆनु...
अद्भुतमगु रूपुगलिगि
अंग बलमु गल आ कपि
विविध वन्यमृगमुलतो
विंतलॊलुकु अंदमुगल
अंत: पुरोद्यानवनमु
नंतयु ध्वंसमु जेसॆनु!
आ वन विध्वंसकुनिकि
अरिगॊनु शिक्षनु विधिंचि
अट्टि विनाशमु नापुट
काज्ञनीय गोरॆदमु”
अंतट रावणाधीशुडु
आरितेरिन किंकरुलनु
आ वानरुनि पट्टुकॊनुट
काज्ञ नॊसगि पंपिंचॆनु....
पर्वतमुल पॆकलिंचॆडु
बल भीमुडु हनुमंतुडु
भूमिनि तोकतो कॊट्टि
भूकंपित ध्वनुलु चेसॆ!!
महाकायुडै पॆरुगुचु
मदिंचि भुजमुल तट्टग
लंक शब्द भरितमै
प्रतिध्वनिंचॆ भीषणमुग!!
“राजवंश धीरुलैन
रामलक्ष्मणुलकु जयमु!!
राज सुग्रीवुनकु जयमु!!!
श्रममॆऱगनि कोसलपति
श्रीरामुनि दासुडनु...
शतृहतमु जेयु
वायुपुत्रुड,
नेने हनुमनु...
राळ्ळु, चॆट्लु, चेमलतो
रणमुन पोराडगलनु!
वेयिमंदि रावणुलनु
दूयगॊट्टि हतमार्चॆद!
राकासुलु चूचुचुंड
लंकनु ध्वंस मॊनरिंचि,
सति सीतकु मॊक्कि नेनु
समृद्धुडनै वॆडलॆद...
महात्मुडगु श्रीरामुनि
मक्कुडु शतृवुलारा!
स्वामितोड वैरमु मिमु
सर्वनाशनमु जेयुनु...
मीरुंडरु!
रावणुडुंडडु!
लंकापुरि वुंडदु!"
इट्लु पलिकि हनुमंतुडु
गरुत्मंतुनि चेजिक्किन
गरळ भरित भुजगमु वलॆ
पिडिकिट इनुप गुदिय बट्टि
पिंडि चेसॆ दानवुलनु!
किंकर सैन्यमु नशिंचि
'किर किर' क्रोधाग्नि रगिलि
युद्धमुलो सिद्धहस्तुडैन
प्रहस्तुनि सुतुनकु
हनुमनु हतमार्पुटकै
आज्ञनॊसगॆ
लंकेशुडु....
क्रूरमैन कोऱलतो
कूकरिंचु 'जंबुमालि”
प्रहस्तुनि पुत्रुडु
धीरुडु,
प्रवेष्टमुन धनुवुनु गॊनि
प्रतिस्पर्धकै वॆडलॆनु...
हनुमंतुनि धाटिकतडु
असुवुल नर्चिंचु कॊनग
रावणु डति कृद्धुडगुचु
राजस मंत्रुल सुतुलकु
हनुमंतुनि वधमुकॊऱकु
आदेशमु लंदजेसॆ...
अवनिलोन साटिलेनि
आंजनेयुनि पराक्रममुन
कागलेक वीरुलैन
असुरु लॆंदरो हतुलै,
इतरु लॆवरु वच्चिननू
इट रणमुनकु सिद्धमगुचु
वानरोत्तमुडु
तिरिगि
वनद्वारमु कडकेगॆनु....
महाबल पराक्रमुडगु
मारुति, भीषणरणमुन
मंत्रि पुत्रुलंदरिनी
मसि जेसिन वार्तलु विनि,
चतुरंग बलसमेतुलैन
चतुरुलु हतुलगुट जूचि,
युगांतमुन यमुनि बोलु योध-
मारुति गाविंचिन
दुर्गतिकै परितपिंचि, दुष्टुडु रावणासुरुडु
तन दुःखमु लोलोन मिंगॆनु!
विरूपाक्ष यापाक्षुलु
विक्रम वीरुलु,
योधुलु...
दुर्धर, प्रघन, दान कर्णुलु
दुरंधर सैन्याधि पतुलु....
हनुमंतुनि चंपुटकै
आज्ञापिंप बडुटचे
रथ गज तुरग पदातुलु
रयमुग गॊनि
युद्धमुलो
कदनुदॊक्कि ई वीरुलु
कदिलिरि हनुमनु गॊनुटकु...
अंतटि घन बलगमुतो
हतमैरी अयिदुगुरू!!
तिरिगि वनद्वारमु कड
करिगिन हनुमंतुडपुडु
युगांतमुन यमुनि बोलॆ
'भग भग' प्रज्वलिंचॆ
मरल!
धुरंधरुलैन अयिदुगुरि
दुर्मरणमुनु विनिन पिदप
कय्यमुनकु कालु दुव्वि
कदनु दॊक्कु योधयैन
अतिधीरुडु, अस्त्रवेत्त
अविरळ तेजस्वियैन
इंद्रजित्तु, तंड्रि याज्ञ
निच्चगिंचि, तन मदिलो
'हनुमंतुनि चंपुट बहु
असाध्यकार्यम'नि तलंचि,
बडबानलमुनु गक्कॆडु
ब्रह्मास्त्रमु संधिंचॆनु!!
ब्रह्मास्त्रपु बलशक्तिनि
बागुग हनुमंतुडॆऱुगु....
'शस्त्रमेदियुनु तनपै
शक्ति जूप जाल' दनॆडु
वरमिच्चिन सृष्टिकर्त
वचनमुलनु दलचुकॊनुचु,
आ यानति ननुसरिंचि
आस्त्रगतिकि किंचु लॊंगॆ!
मत्तगजमु वलॆ घनुडगु
मारुतिनि बंधिंचि राक्षसुलु
रावणाधीश्वरुनि चॆंतकु
'रयमुग गॊनि पोयि, अचट
पुंखानु पुंखमुलुग
पुन: पुनः: प्रश्नजेसिरि
“ऎव्वडितडु? ऎवनि वाडु?
ऎंदुकिटकु विच्चेसॆनु?
इचट नितनि कार्यमेमि?
ऎवरि कडकु वच्चॆ” ननुचु
पलुविधमुल चर्चिंचुचु
पवन सुतुनि
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