Sankshipta Sundarakanda - A Telugu Poem

By Padmashri Elchuri Vijayraghavrao


||om tat sat||
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A Brief narration of
Valmiki Sundarakanda
by
Pandit Elchri Vijayraghavrao

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सुंदरकांडमु

1 समुद्र लंघनं

(next)

जननि जानकि जाड गनमनि
जांबवंतुडु चॆप्पगाने,
शतृनाशकशौरि हनुमडु
सिद्धमै, तनु गगन वीधिन
रावणासुर राच वीडुकु
रयमुगा पयनिंच गोरॆनु

दुरधिगममै मानवाळिकि
दुष्करमैन सागर लंघनमु
निर्विघ्नगति निर्वहिंचुटकु
निज शिर कंठमुलु निक्किंचिन
वीरयोधुडु मरुत्वंतुडु
वृषभ राजेंद्रुनि वलॆ शोभिंचॆ!

अपुडु सूर्यमहेंद्र पवनुल
किंपुगा ब्रह्मा भूतमुलकु
अंजलि घटिंचि, अंबुधि दाटुट
कांजनेयुडु पोवनॆंचॆनु...

अंगद जांबवादुलतो
अनियॆनिट्लु पवनसुतुडु

“श्रीरामुनि शरमु भाति
चिंदु द्रॊक्कि वायुवीधि
रावणरक्षित लंककु
रंहणमुग चेरि, अचट
करुणामयि सीतम्मनु
कनुगॊन लेक पोयितिनो,
नागलोक स्वर्गादुल
नलसट नॊंदक चरिंचि
रावण सहितमुगा आ
लंकनु पॆकिलिंचुकॊच्चि,
एविधमुगनैन सरे
ऎत्तुबट्टि वॆदकि तुदकु

तीरु ऱीति सीतम्मनु
तीसुकुने मऱलिवत्तु”

महावेग संपन्नुडु
मनोधैर्य महाबलुडु
गरुडुनिला कपिवर्युडु
गगन वीधि लंघिंचॆनु!

'सुनायासपु नभोगतिकै
सूर्यदेवुडु रश्मि नार्पॆनु...!

राम कार्यपु सिद्धि कॊऱकै
रंजिल्लॆ नट मलयमरुत्तु...!

आकस वीधि नधिगमिंचिन
अंजनसुतुनि बुषुलु पॊगडिरि...!

'देवगंधर्वु लेक कंठमुन
देदीप्यमानमुग श्लाघिंचिरि...!

“इक्ष्वाकु कुलवेल्चु रामुनिकि
इंपॆनलारु मंत्रिमारुति;
आयानपु गमन श्रमनु बापि
अतनिकि विश्रांतिनिच्चि,
मुंदुमार्ग मवलीलगा दाटि
मुंदुकेगुटकु तोद्पडवलॆ” ननु
आकांक्षनु, समुद्रुडु, तन
अंतर्गर्भमुन दागि अंडगॊनिन
मैनाकुनि किट्लु
आत्मीयततो नुडिवॆनु...

“राम कार्यार्थमै
रयमुग नभोवीधि
आंजनेयुडु वॆडलॆ,
नतडिकि तोड्पड वलयु...

नी शिखराग्रमुन क्षणमु
निलिचि विश्रांति गॊनि
दारि सागिपोवुनु. कपि
दरिजेरनुन्नाडु निन्नु”

इटुले चेयुट कॊऱकै
इच्चगिंचि, निश्चयिंचि
मनसारा मैनाकुडु
मारुति कै वेचियुंडि,

कनकमयपु कांतुलतो
कदनुदॊक्कि शृंगमॆक्कि
वानरेंद्रुनि त्रोवन
वारधिला संधिंचगा,

इतनि ईप्सितमु तॆलियक,
इदॊक विघ्नमनि तलंचि,
वायु वेगमुन मारुति
वक्षमुतो गिरिनि कूल्चॆ!

कपिवर्युनि वेगमॆऱिगि
गगुर्पडिन मैनाकुडु
मानुषरूपमुनु दाल्चि
मंदसमुग निट्लु पलिकॆ

“पवनसुता! दुष्करमैन
'पयोनिधिनि लंघिंचु चुन्नावु!
मा ऎदलो विश्रमिंचि
'मापूजलु स्वीकरिंचु...
मी दर्शन भाग्यमे माकु
मिक्किलि संप्रीतिनिच्चॆ....”

वायुसुतुडु संतुष्टुडै
वात्सल्यमु तो स्पृशिंचि
“अय्या! मी आतिथ्यमु
नंदुकॊन्नट्ले तलंपुमु;
वेगमुगा कार्यमु नॆऱ
वेर्चवलसिन समय मिदि...
'अंतरायमॆंतैना
आलसिंप'ननि प्रतिज्ञ.....
'मार्गमथ्यमुन आगनु.
'मान्युड विक सॆलविम्म”नि
नव्वु मुखमुतो मारुति
न भोवीधि कॆगसिपोयॆ!

वीरुडु मैनाक गिरिपै
विश्रमिंपकुंडुटनु गांचि
महर्षुलु, सिद्धुलु, देवतलु
“महा कार्यमिद”नि
नुडिविरि!

अयिननू महात्मुल मदि
नवतरिंचॆ अभीष्ट मॊकटि!
मारुति बल पराक्रममुलनु
मरॊक परि तिलकिंच दलचिरि!

सूर्य मंडल समुज्वल यगु
सुरसादेवि नाग जननि...

“ रक्तिम पर्वत सदृश
राक्षस रूपमुनु दाल्चि,
अघोरमैन कोऱलतो
आकाशमंतटि नोरु तॆऱिचि,
हद्दुमीरि, कॊंतसेपु
हनुमंतुनि प्रतिघटिंपम”नि
'सुरमुनुला नागजननि
सुरसनु, सत्करिंचि
कोरिरि!

सागरमथ्यमुन आमॆ
स्वरूपमुनु कुरूपिला मार्चि
मनोवेगमुन नॆगसिन
मारुति नड्डगिंचि पलिकॆनु.

“हनुमा! ना काहारमुग
अमरुल चे नॊसंग बडितिवि...
निनु भक्तिंचॆद.
शीघ्रमु ना
नोटिलोकि प्रवेशिंचु”

ऎनुबदि योजनमुल पॊडवु पॆरिगि
ऎत्रयिन आकसमैनदा नोरु!
कपिवर्युडु तॊंबदि योजनमुल
कंचुकोट वलॆ देहमु पॆंचॆनु!
शत योजनमुलु विस्तरिंचिनदि
शैल श्रेणुलवलॆ सुरस नोरु!

मिंचु बुद्धिबलुडु मारुति
मिक्किलि वेगमुतो, तनु
अंगुष्ट मात्रुडै, नोटिलो
अवलीलगा जॊच्चि, तुदकु
आत्रमुगा बैटिकॊच्चि,
अंतरिक्ष वीधि कॆगसि
असुर सुरस तो निट्लनॆ

“दक्षपुत्री! नमस्सुलु...
नुव्वु गोरिन रीतिगने
नी वदनमुन जॊच्चितिनि...
वंद्युडु ब्रह्मा नी किच्चिन
वरमु सत्यमायॆगदा!
वैदेहि नन्वेषिंचवलयु
नाकु सॆलवु मरिक...”

राहुमुख विमुक्तुडैन
रजनीकरुनि भाति
“कळ “कळ" लाडुतू बयल्पडिन
कपिवर्युनि गांचि सुरस
निजरूपमुनु दाल्चि
निर्भयमुग निट्लु पलिकॆ

“कपिवर्या! शुभमु.... शुभमु...
कार्य सिद्धि गलुगु गाक!
सीतादेविनि महात्मुडगु
श्रीरामुनि तो गलुपुमु...”

“मन हनुमडु साधिंचिन
मरो महाद्भुतमिदि!” अनि
सकल भूतमुलु प्रीतिग
संतसिंचि
प्रस्तुतिंचॆ!

आकसमंदॆल्ल ऎडल
'हनुमंतुडु गानवच्चॆ!
अतडट्लैगुरुटनु जूचि
अचट 'सिंहक' यनु राक्षसि
तन नोटिनि दॆऱिचि चाचि
तनुवु मेघगर्जन जेसि,
कामरूप धारिणियै
कपिवर्युनि वॆंबडिंचॆ!

राक्षसि देहमुन जॊच्चि
रगडि नखमुलनु गुच्चि
आयुवु पट्टुलनु चील्चि
आकसमुन कॆगसॆयोध!

गग्गतिल्लि गुंडॆलदिरि
गति तप्पि नीट बडॆनु
सिंहिक!

पवनसुतुनि चेति चावु
पर ब्रह्म निर्णयिंचॆनट!

मारुतिचे चंपबडिन
मायल रक्कसिनि गांचि
गगन चरुलैन भूतमुलु
गारमुतो मरॊक सारि
सिंहका मर्दनुनितो
सिंहवलोकनमु चेस्तू,

“महात्मुडा! नीविपुडी
महाप्राणिनि हतमार्चि
ऎदुरु लेनि घनकार्यमु
निंपुग साधिंचिति वया!

निजधैर्यमु, सूक्ष्मदृष्टि,
निशितबुद्धि, सामर्थ्यत,
ऎवनि कुंडुनो आतडु
ऎंतेनि साधिंप गलडु!”

गगन चरुलचे घनतग
गौरविंपबडि मारुति
कार्य निर्वहण परुडै
कदलि कदलि कडलिपैन
'नूरु योजनमुल कवल
नूत्न वनश्रेणिगांचॆ!

महासागरपु तटिलो
'मलय पर्वताग्रमंदु
विविध दृम भूषितमै
विंत विंत सॊगसु ललरु
नानालंकृत दृश्यमु
नतडु गांचॆ नभमु नुंडि!

साटिलेनि बलवंतुडु
समुद्र लंघनमुन दिट्ट
महा वेग दीपितुडगु
महानुभावुडु मारुति...
लवणाकरमुलनु दाटि
लंका नगरिकि चेरॆनु....
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||om tat sat||

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