Sankshipta Sundarakanda - A Telugu Poem

By Padmashri Elchuri Vijayraghavrao


                           
||om tat sat||
 
A Brief narration of
Valmiki Sundarakanda
by
Pandit Elchri Vijayraghavrao

सीतान्वेषण
(Next)

'राम कार्य निरतुडैन
भीमबलुडु, क्षणमु निलिचि,
लक्ष्यसाधनार्थमु तगु
लक्षमु भाविंच दॊडगॆ

“परम जटिल पटिम तोड
परुल कंट बडकुंडा,
रात्रि
सूक्ष्मरूपु दाल्चि
लंकापुरि जेरवलयु....

दुष्प्रवेश नगरिलोन
दुमिकि
निशीधिनंदु
सकल गृहमुलंदु वॆदकि
संदर्शिंतु जानकिनि”

रम्यालंकृतमै बहु
रत्नखचित वसनमुलतो
“सुंदरि” वलॆ लंकापुरि
'सुदूरमुन वॆलुगुचुंडॆ!

भवनांतर दीपमाल
भव्य भासमान मगुचु
चीकट्लनु पारदोलि
चिंदुलाडॆ अंदमचट!

'प्रबलबलुडु पवनसुतुडु
नगरि प्रवेशिंचगने
स्वेन रूप धारि - “लंकिणि”
हीनमैन दृक्कुलतो
गर्जिस्तू कोपिस्तू
अग्र भागमुन निल्चुनि अडिगॆ प्रश्न
कपिवर्युनि

“वनचरुडा! ऎवरु नीवु?
वच्चिन पनि चॆप्पु त्वरग...
नी प्राणमु पोक मुंदु
निजमु तॆलिय जॆप्पु माकु”

“प्रेक्षणीयमैन नगरिनि
प्रेमतो वीक्षिंच वच्चिति....
मेलैन प्राकारमुलतो
मेटि नगरि गदा, लंक!
कनुल पंडुगगा नेनु
कन वलॆननि कुतूहलमु”

अंत, लंकिणि भयावहयै
अदुरु सिंहनादमु सल्पि
वायु वेगमुन तलपडि
वानरेंद्रुनि कॊट्टॆनु!

कदन ध्वनि प्रतिध्वनिग
कपिसिंहमु गर्जिस्तू
पिडिबिगिंचि ऎडम चेत
पिप्पि पिप्पिगा बादॆनु!!
ताळलेक दिम्मदिरिगि
'नेलबडॆनु विकृत वनित!
गर्वमुडिगि कंपिस्तू
गद्गद स्वरमुन बलिकॆनु

“घनशूरा! जालिगॊनुमु....
कपिवर्या! कापाडुमु...
पूज्युडैन ब्रह्म नाकु
पूर्वमॊक वरदान मिच्चॆ

“निन्नॊक वानर वीरुडु
निलुवुन लोबरुचुकॊनुनु...
ए दिनमदि जरिगिनदो
अक्षणमुन राक्षसुलकु
अमितमैन कीडु मूडु...

अदितथ्यमु.... ब्रह्मावाक्कु....
अंदुकु तिरुगुडे लेदु...

नीदर्शन भाग्यमुगा
ना वरमु फलिंचिन दिक
रावणरक्षित नगरिकि
रा गोरॆद महाशया!
वांछित कार्यमु लन्नी
वलयु विधि
नॆऱवेर्चु कॊनुमु”

कामरूपमुनु दाल्चिन
कामिनि - लंकानगरिनि,
विक्रम तेजस्वि हनुम
विजय वंतमुग जयिंचि,
निजबाहुवु शक्ति पॆंचि
निशि, प्राकारमुलु दाटि
सुग्रीवुनि हितमु कॊऱकु
सूटिग ने तॆंचनटकु...

शतृवु तलपै मॊत्तिन
शस्त्रमुवलॆ, कपिवर्युडु
मॊट्ट मॊदट ऎडमकालु
मोपॆना धरित्रि मीद....

विविधमैन आकृतिगल
विंत विंत भवनमुलनु
ऒकटि वॆंट मरि यॊक्कटि
वॆदकि वॆदकि गालिंचॆनु....

सीता दर्शनमुनकै
सीमितमैन मनस्सुतो
अंदमैन सुंदरांगु लॆंदरिनो जूचॆ,
कानि,

अनन्य सौंदर्यवति
अतुल सदाचारमुल खनि,
रावण संहरणार्थमु
राजिल्लिन सति “जानकि”
नॆंदॆंदु वॆदकिननू
संदर्शिंप लेक पोयॆ!

ऊरि कोन कोनल गल
उद्यानमु, प्राकारमु,
प्रहस्त, महापार्व्युलुंडु
प्रभुत्व प्रागारमुलु, मरियु
कुंभकर्ण विभीषणुल
गृह, शयनागारमुलनु,
आवंतयु भयमु लेक
अतडिंटिंट वॆदकॆनु!


महाबलुडु मारुतिटुल
मर्ममुलनु शोधिस्तू
राक्षसेंद्रुनि अंत:पुरमुन
राणिंचु मंदिरमुलु गांचॆनु...

वज्रवैढूर्य भरितमैन
वर वर्णपु गवाक्षमुलु
वर्षबुतुवु मॆरुमुलतो
वय्यारपु मेघमाललै,
विविध विहंगमु लच्चट
विंत शोभ नलरिंचॆनु!

इंद्रसभनु तलदन्निन
ई भवनमुलो मध्यन
वज्रखछित बारुलतो
अलंकरिंचिन विमानमुनु
आंजनेयुडु तिलकिंचॆनु!

देवशिल्पि विश्वकर्म
देदीप्यमानमुगा
सृष्टिकर्त ब्रह्मकॊऱकु
सृजियिंचिन
“पुष्पक” मदि!

अनंतरमु कपिवर्युडु
अद्भुत दृश्यमुगांचॆनु!

नानावर्णांबरमुल
नाण्यमैन वेष भूषतो,
पुष्प मालिकलु धरिंचि
पुत्तडि बॊम्मलवलॆ मॆऱिसॆडि
सहस्र वर नारी मणुल
'समूहमट, सुंदरमुग
रत्नकंबळमुलपैन
राजिल्लिन दृश्यमदि!

कुलीनुला सुंदरी मणुलु,
कृत्यमॆऱिगिन धर्मपत्नुलु.
'सव्यमुगा रावणुनिकि
सर्वोप चारमुलु चेयुदुरु.
अपेक्षिंच दगनि वारु
अतनि भार्यललो लेरु.

“सीतमात मात्रमु ई
स्र्रीलकन्न उत्तमुरालु...
दुर्‌वृत्तुडु रावणुडॆंत
दुष्कृतमुनु सल्पॆनो!” अनि
पवनसुतुडु परितपिंचॆ!

स्फटिक निर्मित रत्न भूषित
प्रमुख सौधमु
शयन गृहमदि....

इंद्र शयनागारमुनु बोलॆ
इंपैन पडक गदि
रावणुनिदि.....

तटिल्लतल वंटि कांति
तनुवु स्वर्ण वर्ण मयमु,
अंत:पुरमुनकु राणि
अंदगत्तॆ “मंडोदरि”.
पराक्रमुडु पवनसुतुडु
पराकुगा गमनिस्तू
आ यौवन संपन्ननु गनि
“आमॆये सीतिय"नि भाविंचि
हर्षितुडै उप्पॊंगॆनु!

क्षण भंगुर संतसमदि!
क्षतमैनदि मदिलो भ्रम”

“राम वियोगमु पॊंदिन
भामिनि - महासाध्वि सीत
आहार निद्रा पानीयमु लं
दासक्ति चूपदु.....
ईमॆ मंडोदरि;
सीत कादु.....”
मारुति चिंतिंप
दॊडगॆ

पतिव्रता दर्शनमुनकु
'पवनसुतुडु तह तह पडॆ!
अन्वेषण सागिस्तू
आंजनेयुडा भवनमुन
अंत:पुर लतागृहमु,
अच्चट गल मंदिरमुल
नन्निटिलो वॆदकिननू
आमॆ मात्रमगुपड लेदु!

'विरूपुलू, कुरूपुलू,
विविधाकृतुलुंडि रचट...
कानि,
सीत कानरादु!

अनन्य सौंदर्यवतुलु,
अलरारु गंधर्व वनितलु....
कानि,
सीत कानरादु!


पूर्ण चंद्र मुखुलै
सुश्रोणुलैन नागांगनलु...
कानि,
सीत कानरादु!

रावणुडु देवतलनु मर्दिंचि
राक्षसत्वमुतो दॆच्चिन
देव कन्यलचट गलरु....
कानि,
सीत कानरादु!

रतनपु जानकिनि गानक
रावणुनि मंदिरमु नुंडि वॆडलि
तपिंचिन मनस्सुतो
तनलो तनु चिंतिंचॆनु

“मऱल मऱल लंक यंदु
मात सीतनु वॆदकॆदनु;
नेनु सीतनु चूडनिदे,
पोनु रिक्त हस्तुडनै....

नामूलमुग वानरुलकु
नाशनमु कलुगकुंडु गाक...
ऎंदरो महानु भावुलंदरिकि
नमस्करिंतु.....


श्रीराम लक्ष्मणुलकुनु,
सीता देविकि मॊक्कॆद....
रुद्रुनकुनु, इंद्रुनकुनु,
यमुनिकि, वायुदेवुनकु,
रूढिग प्रणमिल्लि नेनु
रुव्वुन मुंदडुगु वेतु...

अदिगदिगो
दृमशोभित
अशोकवनवाटिक! अट
वॆदुकलेदु गान, नेनु
वॆळ्ळि प्रयत्निंचॆद” ननॆ...

अंत:पुरि वदलि हनुम
अशोकवनमुन केगॆनु.....
तरुणांकुर पल्लवमुलु,
तलिरुचु पुष्पगुच्ळमुलु गल
शिंशुपाक वृक्ष मॆक्कि
“श्रीरामुनि वियोगमुन
सीत दु:खपीडितयै
ऒकचो निलुवक इटुनटु
ऒंदिलितो संचरिंप
तानु चूडगल” ननु कॊनि
तापत्रय पडॆ नातडु.....

परिपरिविधमुल चिंतलु
परि गॊनिगॊनि पवनसुतुडु
जानकि आगमनमुनकु
जाग्रमुगा वीक्षिस्तू
शिंशुपाक वृक्षमुपै
शिरमुनु दशदिशलु तिप्पि
दट्टमैन लतापुप्पदरिनि दागि
वेचि युंडॆ....

वनमुलोन सुदूरमुन
ऒक युवतिनि गांचॆ नतडु....

माय रक्कसुल मध्यन
मलिन वस्त्रमुलु धरिंचि,
उपवासमुचे कृशिंचि
उत्तलपडु दीनुरालु!

शुक्लपक्ष चंद्रुनि वलॆ
शुष्किंचिन निर्मलात्म!

सुव्विशाल नेत्रद्वयि
सुडिबडि मलिनमै तपिंचु
सुदतिनि चूडगने
हनुम

“संतप्तुरालैन ईमॆ
सति सीतये” ननि ऊहिंचॆनु...

“श्रीरामुनि कीमॆ प्राणमु...
ईमॆकु रामुडे दैवमु...
मग्नमैन मनसुलतो
महावियोगमुनु भरिंचि
प्रभुवु रामुडिंतवरकु
ब्रतिकि युंडु टाश्चर्यमे!”

“जानकिकै श्रीरामुडु
जगति मुल्लोकमुल गूल्चि
ताऱु माऱु जेसिननू
तगुननि ये दोचुचुन्नदि!”

सीता देविनि कनुगॊनि
सिक्तमैन आनंद बाप्पमुलतो
श्रीराम लक्ष्मणुलकु श्रद्धग
स्वीय नमस्कृतुलर्पिंचि

हनुम
शिंशुपाकमुपै रहस्यगति
शिरमु वाल्चि परिकिंचु चुंडॆ....

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||om tat sat||

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