Sankshipta Sundarakanda - A Telugu Poem

By Padmashri Elchuri Vijayraghavrao


A Brief narration of
Valmiki Sundarakanda
by
Pandit Elchri Vijayraghavrao




सीतारावण संवाद
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प्रात:कालमु...
पावन घडियलु...
पवनसुतुडु गनॆ
पंजन दृश्यमु!

षडंग वेद विदुषुलैन असुरुलु
सौम्यमुग चेसिरि वेदघोष!
मनोज्ञ मंगळवाद्य ध्वनुलतो
महाबलुडु “दशकंठुडु”
मेल्कॊनि
दास दासीलु स्तुतिंचगा, आ
दानवेश्वरुडु वनमुनकु जेरॆनु....

भूषणोत्तम भूषितुडै
भूयिष्टमैन प्रकाशमुतो
रूपयौवन संपन्नुडैन
राक्षस राजुनु चूडगने
कठोर वायुघात मॊंदिन
कदळीफल वृक्षमु वलॆ
राजपुत्रिक साध्वि जानकि
रवरवमु कंपिंच दॊडगॆनु...

नित्य पतिव्रता तपस्विनिकि
निरानंदमैन दीनगति!

मधुर भाषणलतो सीतकु
मनोभीष्टमुनु तॆलिपॆ
रावणु डिट्लु

“विशालाक्षी! विवेकवती!
विमल विशृत मनोराज्जी!
सुंदरी! निनु मोहिंचिति
प्रिया!
अंदमुग नन्नंगीकरिंपुमु...
भ्रांतिनि विडुवुमु...
भार्यवगुमु...
अपहरिंचि नेतॆच्चिन
अति शय सुंदरीमणुल
कग्रेसरुरालवैन अतिववु!
ना राराज्जिग नर्पिंचॆद सर्वस्वमु...

नन्नॆदिरिंचि निलुवगल
नाधुडी लोकमुन लेडु;

जगत्सर्वमुनु जयिंचि
जनकुडु नी पितकिच्चॆद;
विलासवती! सीता!
विनुमिक ना विन्नपमुनु”

गडुसरि दानवुनि मुंदु
गड्डिपोच नॊकटि पॆट्टि
पवित्रमंद हासमुतो
पलिकॆनिट्लु सीता देवि

“राक्षसा! रावणा!
राकॊट्टु अविनीति...
सत्पुरुष नियममुनु
चक्कगा गमनिंचु...

नी भार्य नॆटुल नुवु
निरति रक्षिंतुवो
पंतमुग परुलु तम
पडतुलनु कापाडुदुरु...

नियति गल मनसुतो
नीवु सत्तमुडवै
ननु रामुनिकि समर्पिंचु मिक
शुभमगुनु....

माट तप्पिन ऎडल
मरणमे तथ्यमगु....

वज्रायुधमु निन्नु
वधिंचक पोयिना
यमुडु निनुगॊनिपोक
क्षमजूपि वदिलिना,
वीरराघवुडु निनु
विडुवडनि तॆलुसुको...

कुबेर वरुणुल शरणागति नी
कुळ्ळु असुवुलनु रक्षिंप जालदु...
आशनिपात माविर्भविंचिन ऎड
आगदु महावृक्षमैना, आधाटिकि...

राक्षस राजा! निस्संदेहमु,
रामुनि बारिकि ताळलेवु नुवु”

प्रियदर्शिनि जानकि पलिकिन
परुष वाक्यमुलु विनिन रावणुडु
“मैथिली! इट्टि वाग्बर्बरतकु
मरणमे नीकु प्रायश्चित्तमु...

गडुविक रॆंडु मासमुलु मुडियगने

कांता! शयनिंचवलॆनु नातो;
पतिगा ननु वरिंपनि ऎडल निनु
प्रातःकालमु चंपि वंडॆदरु!”

शतृभंजनुडु राक्षसराजगु
रावणुडिट्लु वैदेहितो जॆप्पि,
अचटि भयंकर राक्षसस्त्रील
नंदरिनी तनु आज्ञापिंचॆनु

“रक्कसुलारा! जानकि ऎदलो
रागानुराग मंकुरिंचवलॆ;
साम दान भेद दंडमुलतो
साधिंचि वशमु जेसुकॊनुडिक”

क्रोध भरितुलै राक्षसवनितलु
कर्मशमुग
जानकिनि निंदिंचिरि
“पुलस्त्य प्रजापति वंशमुलो
पुट्टिन उत्तमोत्तमुनि सतिवै
अनुपम सुखसंपदलनु पॊंदुट
अतिघनमनि नीकेल तोचद”नि
अरमरलु तॆलिपि
आक्रोशिंचिरि!

“मुल्लोकमुलंदलि संपदलकु
मुकुटमु पट्टिन रावणेश्वरुनि
मुदमुग भर्तग गैकॊनि जगमुन
मुरिपॆमुगा जीविंचवलॆ”
ननिरि....

राक्षसस्त्रील तर्कमु नॆऱिंगि
रालिन कन्नीरु तुडिचि, जानकि
“दीनुडैननु, राज्यहीनुडैननुगानि
धीमंतुडगु रामुडे नाकु
अधिपति....

सूर्यपुत्रि सुवर्चलपै
सुमुखुडैन हनुम पोलॆ
रामानुरागमे
रम्यमगु ना आत्मकु”

विशालाक्षि सीतादेवि नपुडु
विकृत राक्षसांगनलु पीडिंचग,
शिथिल हृदय भारमु सहिंचुचू
शिंशुपाक वृक्षमु दरि
जेरॆनु....
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||om tat sat||

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