Sankshipta Sundarakanda - A Telugu Poem
By Padmashri Elchuri Vijayraghavrao
A Brief narration of
Valmiki Sundarakanda
by
Pandit Elchri Vijayraghavrao
त्रिजटा स्वप्नमु
(next)
पलुपलु विधमुलु भयंकरमुगा
परुष वाक्यमुलु बलिकि रक्कसुलु
परिपरि सीतनु बाधिंचुट चे
भरिंच नेरक आक्रंदिंचॆनु....
“ 'मल मल' शोकाग्निलो मग्गितिनिक
मरणिंचुटये मदीय श्रेयमु;
राक्षस युवतुल बंधनमु वीडि
रामुनि कड जेरुट दुर्लभतममु.....
पापात्मुराल, ननार्युरालनु,
प्राणसखुनि विडिचि ब्रतिकि युंटिनिट!
क्षम नशिंचिनदि. निस्संदेहमु,
क्षण कालमैन ब्रतुककूड दिक.....
राक्षसुलारा! हतमार्चुडु. ननु
रंपियतो खंडिंचि भक्तिंच
रंडु! नेनु सिद्धमुग नुंटि निट
रामुनि विडिचि जीविंपजालनिक.....
रघुकुल तिलकुडु रामुडु नेनिट
लंकलो नुंटिननि तॆलिसिनचो
रौद्रुडै, धनुर्धरुडै जगमुन
राक्षसुले लेनट्लॊनरिंचुनु....
भर्त मरणमुन कसुरलु नावलॆ
भग्नहृदयुलै आक्रंदिंतुरु....”
भयंकर स्त्रीलु
जानकिनि चुट्टि
परुषमुगा पलुकुचुनेयुंडिरि
“दुष्टुरालवगु ओ सीता! निनु
दुर्गतिपालु जेसॆदरु. तृटिलो
निन्नु चंपि, नी मांसमुनु वीरु
निरति रुचिकरमुग भक्षिंतुरु”
वृद्धराक्षसि “त्रिजट”
कृद्धुलै वर्तिंचु
राकासि वनितलनु
राकॊट्टि इट्लनॆनु
“दुष्ट वनितलारा! ई जानकि
द्युतिगल जनकराज पुत्रिक;
दशरथ महाराजुनकु कोडलु....
भक्षिंच दलतुरा?!
अन्यायमु!
बदुलुग मिमुलनु
मीरेतिनि वेयुडु...
दंडि निद्रलो मेल्कॊनिन नेनु
दारुणमैन स्वप्नमुनु गंटिनि...
राक्षस विनाश कारकमै, श्री
रामुनि विजय सूचकमु, आ कल....”
कल ऎट्टिदो
कौतुकमुग
असुर लालकिंच दॊडगिरि
“अंबुधि मध्यन
अदॊक पर्वतमु...
आ नगमु पैन
आसीन सीत
सूर्य कांति तन अधिपति
सूर्युनि कड केगिनट्लु
तॆल्लटि वस्त्रमुलु गट्टि
आ तॆल्लटि नगमु मीद
श्रीरामुनि सान्निध्यमु
सीतकु प्राप्तिंचिन कल !
ऐरावतमुनु पोलिन
अंदमैन हत्ति नॆक्कि
रयमुगनट विहरिंचॆडु
रामलक्ष्मणुल जूचिति !!
पावनमगु स्वर्गसीम
पातकुलकु दुस्साध्यमु...
अटुले रामुनिपै जय
मलवि गादु राक्षसुलकु...
ओ राक्षस स्त्री लारा!
ओपिक तो विनगोरॆद...
घोर विपत्तिकि गुरियै
गोरुगिंतयगु निच्चट...
नमस्करिंचि, सति सीतनु
नम्रततो वेडुकॊनुडु;
आदट गल जनक पुत्रि
आपदलनु तॊलगिंचुनु”
इट सीतादेवि
अरण्यरोदन....
भयंकरुडु रावणुनि पलुकुलकु
'भय विह्यलयै रक्कसुल नडुम
निर्जन वनमुन अति वंटरिगा
निलिचिन बालिकवलॆ विलपिंचॆनु!
“अय्यो! राक्षसुडिच्चिन गडुविक
अतिवेगमुग मुगिसि पोवनुन्नदि!
प्रबल पातकमुनकु राजाज्ञगा
प्रातःकालमु मरण शिक्षगानु
चोरुनिवलॆ चॆल्लचॆदिरिनदि मदि....
हा! रामा! लक्ष्मणा! सुमित्रा!
हा! कौसल्या! हा! भूमाता!
नौक सुडिगालिलो सागरमुन
नशिंचिनट्लु सुडिबडिनवि.
असुवुलु.....”
दुर्भरमगु दुःखभारमु वहिंचि
दुरटिल्लुचु, रामुनि ध्यानिंचुचु,
शीर्णमैन देहमुतो जानकि
शिंशुपाक वृक्षमु कड कूर्चुनि
परितापमुतो मति चलिंचि
परिपरि विधमुल योजिंचडॊडगॆ.
तन जडतो उरि पोसुकुनि
तानु तरलि यमुनि कडकेग वलॆनट!!
चितिकिन मदि चिंदगॊनि
चिंतिंचुचु दैन्यमुतो
शिंशुपाक वृक्षमु कड
शीर्णिंचिन वैदेहिकि
“श्रीमंतुडैन अधिपतिनि
सेविंचॆडु भृत्युल वलॆ
शुभशकुनमुलु चुट्टमुट्टि”
सुखमु किंचु
कलिगिंचॆनु!
प्रामाणिकमु लैन अट्टि
प्रसिद्धमगु सूचनलंदि
दैवदत्तमुग सीतकु
धैर्य स्थैर्यमु लब्बॆनु....
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||om tat sat||
Valmiki Sundarakanda
by
Pandit Elchri Vijayraghavrao
त्रिजटा स्वप्नमु
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पलुपलु विधमुलु भयंकरमुगा
परुष वाक्यमुलु बलिकि रक्कसुलु
परिपरि सीतनु बाधिंचुट चे
भरिंच नेरक आक्रंदिंचॆनु....
“ 'मल मल' शोकाग्निलो मग्गितिनिक
मरणिंचुटये मदीय श्रेयमु;
राक्षस युवतुल बंधनमु वीडि
रामुनि कड जेरुट दुर्लभतममु.....
पापात्मुराल, ननार्युरालनु,
प्राणसखुनि विडिचि ब्रतिकि युंटिनिट!
क्षम नशिंचिनदि. निस्संदेहमु,
क्षण कालमैन ब्रतुककूड दिक.....
राक्षसुलारा! हतमार्चुडु. ननु
रंपियतो खंडिंचि भक्तिंच
रंडु! नेनु सिद्धमुग नुंटि निट
रामुनि विडिचि जीविंपजालनिक.....
रघुकुल तिलकुडु रामुडु नेनिट
लंकलो नुंटिननि तॆलिसिनचो
रौद्रुडै, धनुर्धरुडै जगमुन
राक्षसुले लेनट्लॊनरिंचुनु....
भर्त मरणमुन कसुरलु नावलॆ
भग्नहृदयुलै आक्रंदिंतुरु....”
भयंकर स्त्रीलु
जानकिनि चुट्टि
परुषमुगा पलुकुचुनेयुंडिरि
“दुष्टुरालवगु ओ सीता! निनु
दुर्गतिपालु जेसॆदरु. तृटिलो
निन्नु चंपि, नी मांसमुनु वीरु
निरति रुचिकरमुग भक्षिंतुरु”
वृद्धराक्षसि “त्रिजट”
कृद्धुलै वर्तिंचु
राकासि वनितलनु
राकॊट्टि इट्लनॆनु
“दुष्ट वनितलारा! ई जानकि
द्युतिगल जनकराज पुत्रिक;
दशरथ महाराजुनकु कोडलु....
भक्षिंच दलतुरा?!
अन्यायमु!
बदुलुग मिमुलनु
मीरेतिनि वेयुडु...
दंडि निद्रलो मेल्कॊनिन नेनु
दारुणमैन स्वप्नमुनु गंटिनि...
राक्षस विनाश कारकमै, श्री
रामुनि विजय सूचकमु, आ कल....”
कल ऎट्टिदो
कौतुकमुग
असुर लालकिंच दॊडगिरि
“अंबुधि मध्यन
अदॊक पर्वतमु...
आ नगमु पैन
आसीन सीत
सूर्य कांति तन अधिपति
सूर्युनि कड केगिनट्लु
तॆल्लटि वस्त्रमुलु गट्टि
आ तॆल्लटि नगमु मीद
श्रीरामुनि सान्निध्यमु
सीतकु प्राप्तिंचिन कल !
ऐरावतमुनु पोलिन
अंदमैन हत्ति नॆक्कि
रयमुगनट विहरिंचॆडु
रामलक्ष्मणुल जूचिति !!
पावनमगु स्वर्गसीम
पातकुलकु दुस्साध्यमु...
अटुले रामुनिपै जय
मलवि गादु राक्षसुलकु...
ओ राक्षस स्त्री लारा!
ओपिक तो विनगोरॆद...
घोर विपत्तिकि गुरियै
गोरुगिंतयगु निच्चट...
नमस्करिंचि, सति सीतनु
नम्रततो वेडुकॊनुडु;
आदट गल जनक पुत्रि
आपदलनु तॊलगिंचुनु”
इट सीतादेवि
अरण्यरोदन....
भयंकरुडु रावणुनि पलुकुलकु
'भय विह्यलयै रक्कसुल नडुम
निर्जन वनमुन अति वंटरिगा
निलिचिन बालिकवलॆ विलपिंचॆनु!
“अय्यो! राक्षसुडिच्चिन गडुविक
अतिवेगमुग मुगिसि पोवनुन्नदि!
प्रबल पातकमुनकु राजाज्ञगा
प्रातःकालमु मरण शिक्षगानु
चोरुनिवलॆ चॆल्लचॆदिरिनदि मदि....
हा! रामा! लक्ष्मणा! सुमित्रा!
हा! कौसल्या! हा! भूमाता!
नौक सुडिगालिलो सागरमुन
नशिंचिनट्लु सुडिबडिनवि.
असुवुलु.....”
दुर्भरमगु दुःखभारमु वहिंचि
दुरटिल्लुचु, रामुनि ध्यानिंचुचु,
शीर्णमैन देहमुतो जानकि
शिंशुपाक वृक्षमु कड कूर्चुनि
परितापमुतो मति चलिंचि
परिपरि विधमुल योजिंचडॊडगॆ.
तन जडतो उरि पोसुकुनि
तानु तरलि यमुनि कडकेग वलॆनट!!
चितिकिन मदि चिंदगॊनि
चिंतिंचुचु दैन्यमुतो
शिंशुपाक वृक्षमु कड
शीर्णिंचिन वैदेहिकि
“श्रीमंतुडैन अधिपतिनि
सेविंचॆडु भृत्युल वलॆ
शुभशकुनमुलु चुट्टमुट्टि”
सुखमु किंचु
कलिगिंचॆनु!
प्रामाणिकमु लैन अट्टि
प्रसिद्धमगु सूचनलंदि
दैवदत्तमुग सीतकु
धैर्य स्थैर्यमु लब्बॆनु....
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