Sankshipta Sundarakanda - A Telugu Poem

By Padmashri Elchuri Vijayraghavrao


A Brief narration of
Valmiki Sundarakanda
by
Pandit Elchri Vijayraghavrao


सीताहनुमंतुल संभाषण-1
(next)

पराक्रमुडु पवनसुतुडु
सावधानुडैनंदुन
रात्रि त्रिजट” गनिन कललु,
राकासुल कृत्रिममुलु,
साध्वि सीत वृत्तांतमु,
सांतमुगा गमनिंचॆनु...

“प्रात: कालमुनकु मुंदुगने
सीतम्म तल्लि नूऱडिंचवलॆ...
मल्लडिंचु तन दीनस्तितिलो
मरणिंच गलदु
निस्संदेहमु...."

मारुति मदि
मंड्राट मॊंदिनदि...

वैदेहिनि गूर्चि अतडु
वै विधमुल नूहिंचुचु,
मनोज्ञमगु वर्णनतो
मात सीत विनुनट्लुग
मधुर वाक्यमुलु पलिकॆनु;

रामुडु 'तॆलुपवलॆ' नन्न
रम्यमैन वृत्तांत चयनमिदि

“दशरध महाराजु घनुडु...
धर्म मॆऱिंगिन भूवति....
पुण्यमूर्ति. कीर्ति परुडु....
पुरि पुच्चुलु लेनि दिट्ट...
रथ गज तुरग पदातुल
रक्षकुडगु महाराजु...

आ दशरध राजेंद्रुनिकि
अनुगु पुत्रुडे रामुडु...
धनुर्वेत्त... चंद्रमुखुडु...
धर्मज्ञुडु श्रीरामुडु...

तंड्रि याज्ञ ननुसरिंचि,
तनु, सीता लक्ष्मणुलनु
वॆंट गॊनुचु, वेदनतो
वॆडलिवच्चॆ वनवाटिक...

आ कीकारण्यमंदु.
अति विकृत रूपुलतो
अघोरमुलु सल्पुचुन्न
असुरुल हतमार्चुट, विनि,
रामुनिपै कृधितुडैन
रावणासुरुडु, दुष्टुडु
मायामृग वेषमुलो
मात सीत नपहरिंचॆ!

आ महा पतिव्रतकै
अंतुलेनि दुःखमुतो
वनमंतयु वॆदकु चुंड
वानरुलराजु सुग्रीवुनि तो
वात्सल्यमु पॆंपॊंदॆनु....

शतृ नगरमुल शकलमु जेसॆडु
शार्यपराक्रमुडगु श्रीरामुडु,
वालिनि संहरिंचि आ राज्यमु
वानरेण्युडगु सुग्रीवुनि
कॊसंगॆ....

विशालाक्षि सीत कॊऱकु
विक्कुग सागरमु दाटि
'रामुडु जानकि गुरुतुकु
रंगु रूपु तॆलिपिन विधि,
कांति वंतमगु युवतिनि
काननमुन निट गंटिनि!”

मारुति पलिकिन
पलुकुलु विनि विनि
मानिनि जानकि
अच्चॆरु वॊंदॆनु!

शिरोजमुलु सर्दि
मोमुपैकॆत्ति
शिंशुपाक वृक्षमुपै
जूचॆनु!

मॆऱुपुलांटि देहमुपै
मॆऱियु धवळ वस्त्रमुलतो
दृममुपैन गल हनुमनु
जूचि जानकि चलिंचॆनु!

बृहस्पतिकि, इंद्रुनकुनु,
ब्रह्मकु, अग्नि देवुनकु,
नमस्कारमु लॊनरिंचि
नम्रततो प्रार्थिंचॆनु

“वानर वर्युडु चॆप्पिन
वार्तलु सत्यमगुनु गाक!”

अरुण वर्ण मुखपद्ममु,
अविरळ तेजस्सु तोड
वायुसुतुडु वृक्षमु दिगि
वंदनमुलु समर्पिंचि,
वंदिंचुचुनिट्लु पलिकॆ

“अम्मा! देवतवलॆ नी
वतिशय सौंदर्यवतिवि!
रुद्रगणमॊ, मरुदगणमॊ
रुचिरमैन वसुगणमो,
एजातिकि चॆंदॆदवो
ऎऱुक दॆलुप प्रार्धिंचुदु...

दुष्टरावणुनि चऱलो
दुःखितयगु
जानकिवा?
निर्मल मुख सौंदर्यमु
निगुडिंचिन धैर्यमुतो,
वनवासावस्थ यंदु
वगचु राघवेंद्रुनि सति
सीतम्मवु नीवे” ननि
स्थिरमैनदि ना मदिलो”

पतिदेवुनि प्रसक्ति विनि
बहु संतस मॊंदॆ सीत...
आ वृक्षमु कड निलिचिन
'हनुमतोड
निट्लु पलिकॆ...

"थूर्तुडु रावणुडु नन्नु
दुंडगिंचि अपहरिंचॆ...
द्वि मासपु गडुवु निच्चि
तदुपरि हतमार्च नॆंचॆ...
आदुष्करमुकु मिन्नडि
असुवुलु विडिचॆदनु नेनु”

वैदेही करुणहृदय
वैक्षब्यमु नॆऱिगि, नॊच्चि,
वानराधिपति हनुमडु
वैनमुगा निट्लु पलिकॆ

“श्रीरामुनि संदेशमु
शिरमुनॊग्गि वच्चितिनिट;
मी क्षेममु नॆऱुगुटकै
मिगुल वेचियुंडॆ स्वामि”

रामदूत हनुमंतुनि
राककु संभ्रममुनॊंदि
अंजन सुतुनिपै अपुडु
अद्भुतमगु प्रीति गलिगि
आप्यायततो निरुवुरु
अनुवुग संभाषिंचिरि....

“वानरोत्तमा! विनुमिक;
वरदुडैन श्रीरामुनि
वार्त नाकु परम प्रियमु....
आ रामुनि गुण वर्णन
नालकिंप मनसायॆनु”

मारुतात्मजुडप्पुडु
मात सीत मदि ग्रहिंचि
कर्णानंद भरितमैन
कबुर्लतो मुदितपरिचॆ

“सूर्युनि तेजस्सु गलिगि
चंद्रुनि वलॆ चातुरिकुडु...
मन्मध सौंदर्यमु गल
महारधुडु श्रीरामुडु...

ई वियोग दुःखमुचे
मिगुल परितपिंचुचुंडॆ....
नी क्षेममु नॆऱुग गोरि
नन्निट दूतगा पंपॆनु...

वान रेण्युडु सुग्रीवुनि
वद्द मंत्रिनि;
हनुमनु;
समुद्रलंघनमु जेसि
संदर्शिंचिति लंकनु”

श्रीराम चंद्रुनि वार्तविनि
सीत मधुरमुग निट्लनॆनु
“रामुडॆचट संधिंचॆनु?
लक्ष्मणु नॆट्लॆरुंगुदुवु?
मानव मातृलतो ई
वानर समागम मॆट्टिदि?

राम लक्ष्मणुल गुणगण
लक्षणमुलु वर्णिंपुमु.....
हनुमा! नी समाधान
मतिशय वुपशमनमिच्चु”

यथातथमु
क्रमरीतिनि,
बदुलु पलिकॆ
हनुमंतुडु


“कमनीय सौंदर्यमु गल
कमल पत्राक्षुडतडु...
रूपदाक्षिण्यमुलतो
रूपॊंदिन बुद्धिबलुडु...

सूर्युनि वलॆ सुतेजस्वि...
भूदेविकि गल सहनमु...
बुद्धियंदु बृहस्पति
इंद्रुनिवलॆ यशोधनुडु...

जीवलोक रक्षकुडु....
बंधुजनुल भगवंतुडु...
ब्रह्मक्षत्रियादुलकु
धर्मपालनावतंसुडु...

वेद वेदांग पारंगतुडै
वॆल्लिविरियु गुणसागरु डातडु...
सत्य धर्म समधर्म पालकुडु...
सकल संपदल नार्जन चेयुचु
पात्र दानमॆऱिगि विरिविगा
परुलकु धन दानमुल नॊसंगुनु...

देश काल परिस्थितु लन्निटि
ध्येय मॆऱिगि वर्तिंचुनु...
बहुजन प्रीति गणिंचिन
परम पावनुडु रामुडु!

लक्ष्मणुनकु श्रीरामुनि
लक्षणमुले प्राप्तिंचिनवि....
पावनि कौसल्य यॊसंगिन
पायस भागपु मूलमुगा
सुवर्ण देह कांतितो पुट्टिन
सुमित्रानंदनुडु
लक्ष्मणुडु...
श्यामल वर्णुडै मॆऱियु
रामुनि कतिप्रिय अनुजुडु...

अत्यंत कुतूहलमुतो
आ पुरुषोत्तमुलु निन्नु
वॆदकि वॆदकि यत्निंचॆडु
वेळ मम्मुगनिरि निचट!

रामुनितो सुग्रीवुनि
रम्य समागममु जरिगि,
वानरेंद्रुनि आज्ञनुगॊनि
वानर श्रेष्ट लॆंदरो निनु
वॆदकुटकै पंपबडिरि.....

माता! सीता! तमतो
'मरल मरल विन्नविंतु...
वायुसुतुडगु हनुमनु;
वानरुडगु सुग्रीवुनि मंत्रिनि;
रामलक्ष्मणुल दूतनै नेनु
रागल्लिति मीसमक्षमुन....

वैदेही! मी विश्वासार्थमु
वर्णिंचिति राघवुनि घन कीर्त...
रामुडु शीघ्रमेतॆंचि
रक्षिंचि, तिरिगि गॊनिपोवुनु
मिमु....”

आ कधनमु विनि उपशमन मॊंदि
अति संभ्रममुग जानकी देवि
अतनिनि रामदूतगा ग्रहिंचि
आनंद बाप्पमुलु विडिचिनदि!

महाभागयैन सीतादेवितो
मारुतात्मजुडपुडिट्लनॆनु

“वच्चिति. वानर दूतनु.
तॆच्चिति गैकॊनु मिदुगो,
नाममुतो चॆंदुगॊनिन
श्रीरामुनि शुभ मुद्रिक!”

मेनु पुलकरिंपजेयु
मेलैन शुभमुद्रिक गॊनि
रामुनि पॊंदिनट्ले भाविंचि
भामिनि बहुसंतसिंचॆनु!

पवनसुतुनि गॊनियाडुचु
पलु विधमुल प्रश्निंचॆनु

“काकुत्‌स्थुडैन रामुडु
कुशलमुगा नुन्न ऎडल
प्रळयाग्नि रगिल्चि, कृथितुडै
पृधिविनेल दग्धमु चेयडु?

आज्ञ पालनारतुडै
अतडु राज्यमुनु त्यजिंचि
वनमुनकु नन्नु गैकॊनि
वच्चिनपुडु दुःखिंचलेदु...

अट्टि रामुडिप्पुडु ना
अपहरण वियोगमु सहिंचि
दु:खमुतो लॊंगिपोक
धैर्यमुतो नुंडॆगदा!”

वीरुडैन हनुमंतुडु
विनि प्रणतिग शिरमु नॊग्गि
प्रत्युत्तर मॊसंगॆनु

“अम्मा! शीघ्रमुग वॆडलि
अतनिकि नी वार्त नित्तु....

भल्लूक वानरादुलतो
बलिष्टमैन सेननु गॊनि
रामचंद्रुडिक लंककु
रयमुग रादलचिनाडु...

परि क्लेशपूरितुडै
परिपरि 'सीता!' यनुचू
निरतमु निनु दलचि तलचि
निनु गनुटकु यत्निंचुनु”
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||om tat sat||

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