Sankshipta Sundarakanda - A Telugu Poem

By Padmashri Elchuri Vijayraghavrao


A Brief narration of
Valmiki Sundarakanda
by
Pandit Elchri Vijayraghavrao



सीता हनुमंतुल संभाषणमु -2
(next )

पूर्णचंद्रमुखि जानकि
पूनिकतो विनि हनुमकु
तन प्रत्युत्तरमु निटुल
'धर्मयुक्तमुग' निच्चॆनु

“अतडु 'नन्ने तलचिन'
अमृत वाक्यमुनकु तोडु
'विरिविग दु:खितुडैनट्टि'
विषपूरित वाक्कु कलिपि
सुख दुःखमुलनु पॊत्तुग
सूचिंचितिवे हनुमा!!

संवत्सर कालमुननु
संहरिंचुटकु परिमिति
क्रूरुडु रावणु डिच्चिन
कुतंत्रमगु गडुवु नुंडि
पदि नॆललपुडे गतिंचि
पक्कुन रॆंडे मिगिलॆनु....

ईलोपुन रावलॆननि
श्रीरामुनितो चॆप्पुमु

रामचंद्रुनि कडकु नन्नु
रयमुग तरलिंच मनिन
विभीषणुनि विन्नपमुनु
विनने लेदा दुर्मति!”

कन्नीटि बाप्पमुलु कार्चि विलपिंचगा
कपीश्वरुडामॆनु गनि
करुणतो निट्लनॆनु

“अम्मा! नी स्थिति नॆऱिंगि
अति शीघ्रमु श्रीरामुडु
भल्लूकपु सैन्यमुतो
भंडनमुनके तॆंचुनु...

अंत दनुक वेचियुंडुट
असलनवसरमु तल्ली!
नी दु:खनिवारण
ने नीक्षणमे चेयगलनु;

ना कंधमुपै नॆक्कुमु
निन्निपुडे गॊनिपोयॆद...

समुद्र लंघनमु नंदुन
संपन्नुडनगु नापै
संदेहमु वलदु. नेनु
समग्रमुग बलिष्टुडनु...

रावण सहितमुगा ई
लंकनु ने मोयगलनु”

मदिलो संभ्रममु पॊंदि
मारुति तोनिट्लु पलिकॆ

“कपिवर्या! नीवु नन्नु
कंधमुपै मोसुकॊनुट
कोति चेष्ट यनि मदिलो
कॊंचॆमु संकोचमायॆ!”

वायुसुतुडु, बलवीरुडु
वैदेही वचनमु विनि
अवमानमु जॆंदि, नॊच्चि,
आलोचिंच दॊडंगॆनु

“ना बल प्रभावमुलनु
नम्मिनट्लु गानरादु;
नितांतमुग सीतकु ना
निजरूपमु प्रदर्शिंतु”

जगज्जेय मानमुगा
ज्वलित प्रज्वलितमैन
मेरुवु, मंदरमुलवलॆ
मेटि पर्वतमुल कांति

अंत कंत कति घनमुग
आकाशमु वरकु पॆरिगि
विजृंभिंचि प्रचंडुडै
'विश्वरूपमु'नु जूपॆनु!!

वॆल्लिविरियु प्रळयमुवलॆ
वॆऱुपु गॊलुपु वायुसुतुनि
परिकिंचुचु पलिकॆ सीत
“आहो! घनुडवु वानरेंद्रा!

अद्वितीयमुनी सत्वमु!
वायु देवुनि स्फूर्ति,
अग्नि वलॆ तेजस्सु गलिगि
अद्भुतमगु शक्तुलतो
अलंकरितुडवु!

कानी
कपिवर्या! नेनिप्पुडु
कदलिवच्चुटनुचितमगु;

नीवु दुष्ट संहरणकु
निजमुग समर्थुड वैन,
रट्टुग ननु गॊनि पोवुट
रामुनि कीर्तिकि भंगमु...

परपुरुषुनि देहस्पर्श
पति भक्तिकि विरुद्धमगु...

दशरध पुत्रुडु स्वयमुग
दशकंठुनि संहरिंचि
'सबबुग ननु गॊनि पोवुट
सकल विधमुलुग युक्तमु....

वानरेंद्रा! श्रीघ्रमु
वज्रदेहि वनचरमुल
वन्नियगल सैन्यमुतो
रामलक्ष्मणुलु लंककु
रावलॆननि ना कोरिक....

बहुकाल वियोग पीड
भरिंचक कृशिंचु नाकु
परमात्मुनि राक वलन
'परमानंदमु गलुगुनु...”

वाक्चतुरुडैन वातात्मजुडु
वेडु कॊनॆनु वैदेहितो निट्लु.
“दयामयी! रामुनि दूतकु नी
दर्शन भाग्यमु लभिंचिनट्लुग
गुरुतुग श्रीरामुनिकि दॆलुपुटकु
“गुर्तु' नॊकटि प्रसादिंप गोरॆदनु”

देव कन्यतो समानुरालगु
देवि सीत हनुमतो पलिकॆनु
“प्रीतिग ई 'वृत्तांतपु गुरुतु'नु
प्रियुडु श्रीराम चंद्रुनिकि तॆलुपुमु...

चित्र कूटमुन कीशान्यमुगा
सिद्धाश्रम मॊकटि गलदु. अंदुन
ऒकानॊक काकि, मांसमुनु गोरि
ऒद्दुग मुक्कुतो पॊडुचुटनु जूचि,

अट्टि यॆड नुंडि तरिमि वेयुटकु
मट्टिबॆड्ड काकिपै विसिरितिनि;
काकि चेष्टपै कोपिंचुटचे
कन्नीळ्ळु मुखमुपै व्यापिंचगा,
तुडुचुकॊनुट
ना नाथुडु चूचॆनु...

बुद्धि बलुडु, उत्तमुडगु
बाहुबलुडु श्रीरामुडु
भंजकमगु चेष्टचूचि
भरिंच लेनि कोपमु तो
दर्भासनमुलो नुन्न
दर्ब पुल्ल नॊकटि तीसि
ब्रह्मास्त्रमुचे दानिनि
बलमुग अभिमंत्रिंचॆनु!

ऒक काकिनि चंपुटकै
वॊदिलॆनतडु ब्रह्मास्त्रमु!
महपापिरावणासुरुनि
मरि ऎंदुकु क्षमिंचुनो?!”

करुणतो वैदेहि
कार्चिनदि कन्नीरु...
तेजस्वि कपिवरुडु
तॆऱुकुवग निट्लनॆनु

“नी वियोग दुःखमुचे
श्रीरामुडु अति विमुखुडु...
ई विषयमु 'सत्य' मनुट
किट शपथमु चेयुचुंटि”

मदिलो गल चिंत पॆरिगि
मारुतितो पलिकॆनिट्लु
“कौसल्या पुत्रुडैन कोसलेंद्रुडु
श्रीरामुनि कभिवादमुलु दॆलिपि,
अडिगॆद नातनि क्षेममु...

“इंकॊक नॆलरोजुललो
ईमॆ प्राणमुलु विडुचुनु;
दशरध नंदना! सीत
दक्कदु. रक्षिंप मनुचु
पति देवुडु रामुनि तो
परिपरि विधमुल दॆलुपुमु”


इट्लु पलिकि तन चीर कॊंगुलो
गट्टुकॊनिन दिव्यमैन “चूडामणि
'गुरुतुग' रामुनि किम्मनि जानकि
गुणवंतुडु हनुमंतुनि कॊसगॆनु...

“वानरेंद्रुडा! ना संदेशमु
विनि, महा वीरुडैन नापति
अति पौरुषमगु अविकल्पमुतो
नन्नु पॊंदुटकु जतनमु सेयुनु”

सीत वाक्यमुलालकिंचि
शीघ्रमुगा वायुसुतुडु
तलनु वंचि, केलु मोड्चि
तन प्रत्युत्तर मॊसगॆनु

“ककुत्‌स्थ वंश वीरुडु श्रीरामुडु
कपुलतो, भल्लूकमुलतो विरजिल्लु
सेननुगॊनि वच्चि युद्धमुन
शत्रुवुल नोडिंचि तीरुनु तल्ली!

कार्य निर्वाहकृत निश्चयुडै
कदलि वच्चुनिट सुग्रीवुडपुडु;
ओ वैदेही! वॆय्‌ वेल कोट्ल
वानर वीरुल निटकु गॊनिवच्चि
असुरुल सैन्यमु लंतमॊनरिंचि
अति शयमगु विजयमु साधिंतुरु!

रघुवंशाख्युडु,
बंधु सहितमुग रावण संहारमुनु गाविंचि
अति सुंदरमगु सीतम्मनु-निनु
अयोध्यापुरमुनकु गॊनि पोवुनु...

देवकन्यारत्नमुनु बोलिन
देवि सीत हनुमतो निट्लनॆनु
“हनुमा! नी प्रिय वाक्यमुलनु विनि
अतिसंतसमैनदि नामदिलो;

मॊलक लॆत्तगने तॊलकऱि वानलु
मुदमुग फलसिद्धि नॊंदिंचुनु गदा!

वायुसुता!
रामलक्ष्मणुलनू,
अच्चटि वानर वीरुलतो सह
अंदरिनी क्षेममडिगिति ननवलॆ...
रामुनि सन्निधि चेरिन क्षणमुन,
रावणासुरुनि दुष्कर्मलतो
नेननुभविंचु महदु:खमुनु
नॆट्टनमुग वर्णिंप गोरॆदनु...

सुखमुग वॆडलुमु
शुभमगुनु गाक!”

राकुमारि सीत इट्लनगा, तन
राक सप्रयोजनमैनंदुकु
संतसिंचि, तनुदलचिन कार्यमु
चाल वरकु नॆरवेरिनट्लुगनि,
उत्तम संकल्पमुतो नातडु
उत्तर दिश बोव प्रतीक्षिंचॆनु...

अटनुंडि पयनमै
आलोचिंचॆनु हनुम

“जय सूचकमुग
ने जानकिनि कनुगॊंटि!
अयिनवॆन्नो पनुलु
अल्पमे शेषमिक.....

आ कार्यसिद्धिकै
अति चाक चक्यमुग
दंडोपायमुनु वाडि
दहिंचॆद वैरुलनु....

रणरंगमुलो रावणासुरुनि
बला बलमुलनु बागुग कनुगॊनि
अतनि सहचरुल
नचट ऎदुर्कॊनि
अंतु तेल्चुकॊनि
अपुडु वॆडलॆदनु...”

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||om tat sat||

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